
'लुब्बर पंधु' देख ली? नहीं! अच्छी फिल्म है। इसकी आईएमडीबी रेटिंग भी 8.1 है। इस फिल्म में स्पोर्ट्स ड्रामा भी दिखाया गया है और इंसानी जज्बातों व ईगो की कहानी भी बताई गई है। आइए आपको इस फिल्म के बारे में और बातें बताते हैं।

2/8फिल्म देखते वक्त आपको अपने बचपन के वो दिन याद आ जाएंगे जब गांव या मोहल्ले के मैचों में हार-जीत जिंदगी और मौत का सवाल बन जाती थी। टेनिस बॉल क्रिकेट (जिसे वहां 'लुब्बर पंधु' कहते हैं) को इतने असली ढंग से दिखाया गया है कि लगता है आप खुद बाउंड्री पर खड़े होकर मैच देख रहे हैं।

3/8कहानी दो लोगों के इर्द-गिर्द घूमती है, एक पुराने जमाने का धाकड़ बल्लेबाज 'गेथु' (दिनेश) और दूसरा आज का टैलेंटेड गेंदबाज 'अन्बू' (हरीश कल्याण)। दोनों अपनी जगह सही हैं, लेकिन दोनों का 'ईगो' इतना बड़ा है कि मैदान की लड़ाई घर तक पहुंच जाती है।

4/8इसमें एक बड़ा ट्विस्ट तब आता है जब अन्बू को गेथु की बेटी से प्यार हो जाता है। अब सोचो, जिस आदमी को आप मैदान पर हराना चाहते हो, वही आपका ससुर बनने वाला है! यह सिचुएशन फिल्म में कमाल का तनाव और कॉमेडी पैदा करती है।

5/8फिल्म बहुत ही खूबसूरती से दिखाती है कि कैसे मर्दों की बेमतलब की जिद और अहंकार की वजह से रिश्ते खराब होते हैं। गेथु और अन्बू, दोनों ही अच्छे इंसान हैं, लेकिन 'मैं उससे कम नहीं हूं' वाली फीलिंग उन्हें अपनों से दूर कर देती है।

6/8फिल्म बहुत ही शांति से जातिवाद और भेदभाव जैसे गंभीर मुद्दों पर भी चोट करती है। यह दिखाती है कि कैसे खेल के मैदान पर भी टैलेंट से ज्यादा कभी-कभी आपकी पहचान मायने रखने लगती है, जो काफी इमोशनल कर देता है।

7/8आमतौर पर स्पोर्ट्स फिल्मों में औरतें सिर्फ सपोर्टिंग रोल में होती हैं, लेकिन यहां गेथु की पत्नी 'यशोदा' (स्वाशिका) और उसकी बेटी 'दुर्गा' असली हीरो हैं। वे इन दोनों 'पागल' मर्दों को आईना दिखाती हैं और फिल्म को सही दिशा में मोड़ती हैं। यशोदा का किरदार तो आपको हैरान कर देगा!

8/8फिल्म में 90 के दशक के सुपरस्टार विजयकांत के प्रति जो दीवानगी दिखाई गई है, वह कमाल की है। अगर आप पुराने तमिल सिनेमा के शौकीन हैं, तो छोटे-छोटे 'रेफरेंस' और गाने आपको बहुत खुश करेंगे। आप ये फिल्म जियोहॉटस्टार पर देख सकते हैं।
